narendrakeshkar Narendra Keshkar

जब नलिनी की खूबसूरती उसकी दुश्मन बनती है तो हर नज़र उसके कपड़ों के अंदर झाँकती है लेकिन वो किसी तरह इस वहशी समाज में रह रही थी, समाज के उन भूखे भेड़ियों से बचकर लेकिन आज उसका सामना हुआ ऐसी मुसीबत से जो उसके जिस्म को नोंचकर खा जाएगा और कोई उसका सामना नहीं कर सकता। कैसे बचेगी नलिनी की आबरू? या बन जाएगी वो उसकी हवस का शिकार? क्या करेगी वह जब मुसीबत देगी उसके दर पर 'आखिरी दस्तक'!


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दस्तक

जामनगर की उन व्यस्त गलियों की रौनक तो देखने ही लायक थी। कई दिनों की मूसलाधार बारिश की वजह से थमीं जिंदगी को जैसे ही थोड़ा मौका मिला तो खिल उठा चमन! ...... खुल गई गलियाँ और सज गया बाजार और उस बाजार में भीड़ तो इतनी कि पूछो मत।


आज कद्दू बहुत ही अच्छे आए हैं और भिंडी तो इतनी मँहगी की जैसे सोना। पास ही की दुकान में कांदा लेती मौसी का चार साल का पोता कुल्फी के लिए मचलने लगा, मौसी के मना करने पर वहीं कीचड़ में लोटने की धमकी देने लगा, मौसी आगे खींचे तो वह गाय के बछड़े की तरह पीछे जाए। आखिर में थक हार कर मौसी को उसे कुल्फी दिलानी ही पड़ी। बच्चा जैसे ही कुल्फी खाने को हुआ तभी एक झटका लगा और गई कुल्फी पानी में।


मौसी गुस्से बोली "क्यों री! .... तुझे दिखाई नहीं देता जो मेरे बच्चे को धक्का देकर भागी जा रही है?", उस औरत ने पलट कर माफी माँगते हुए कहा "माफ़ कर दीजिये मौसीजी, थोड़ी जल्दी में थी!" और मौसी के कुछ कहने से पहले ही उसे पचास का नोट पकड़ा कर चली गई।


व्यस्त बाजारों की तंग गलियों से होकर वह उस गली में पहुँची जहाँ उसका घर था। गली में एक तरफ़ मकान थे और दूसरी तरफ़ ऊँची दीवार, सड़क का हाल तो बारिश से देखने लायक था और सडक़ के किनारे कचरे का डिब्बा तो बीच में आकर बडी ही शान से खड़ा था।


उस गलीके सबसे आखिर में जो मकान था वही उसका घर था। दोपहर के साढे चार बजे भी आसमान में उठते घने बादलों की वजह से लग रहा है जैसे सूरज अभी ढ़ल गया। वह घबराई सीतेजी से आगे बढ़ रही थी कि "नलिनी!...." आवाज सुनकर वह जैसे डर कर जड़ हो गई, कुछ पलों बाद उसने डरते डरते पीछे देखा तो कोई नहीं था। कुछ ही पलों में वह अपने घर में चली गई।


दरवाजा बंद करने के बाद भी नलिनी की साँसें धौंकनी की तरह चल रही थी, बाजार में सामान खरीदते वक्त उसे ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसे देख रहा हो, जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो। वह कैसे वहाँ से आई है यह तो वह खुद ही जानती है। पिछले कुछ दिनों में बहुत कुछ घट गया उसके साथ। उसकी बंद आँखों के आगे उसकी यादों की जैसे झांकी निकल रही हो।


कालेज के वो दिन, श्वेता जो उसकी बेस्ट फ्रेंड थी उसके साए की तरह साथ देती थी। फिजिक्स की क्लास से साथ निकलती और शुरू हो जाती लड़कों की ताकाझाकी, कई लड़कों ने उससे दोस्ती करने की कोशिश की लेकिन नलिनी भी किसी भी ऐरे गेरे नत्थू खैरे को घास भी नहीं डालती। अरे कालेज के ब्यूटी कॉन्टेस्ट की रनर अप थी वो, और ब्यूटी क्वीन का ताज़ किसी को भी मिले लेकिन होल्कर कालेज की क्वीन तो वही थी। खूबसूरत तो इतनी कि सबको लगता था कि यह तो मॉडल बनेगी या फिल्मों में अच्छा नाम कमाएगी।


वैसे तो वह किसी लडके में कोई इंट्रेस्ट नहीं लेती थी लेकिन एक था भौंदू जो ना दिखने में कुछ खास था और ना ही बात करने का सलीका। फिर भी नलिनी उससे कभी कभी अपने नोट्स करवाने के लिए बात कर लेती थी।


"नलिनी!..." अचानक उसकी त्रंद्रा टूटी, "नलिनी!!...." , "ज... जी ....... आई!....." सुबोध की आवाज सुनकर वस उसके कमरे की तरफ भागी।


कमरे में सुबोध बिस्तर से नीचे गिर पड़ा था, शायद उसे पानी चाहिए था, जल्दी से नलिनी ने एक ग्लास में सुबोध को पानी पिलाया।


"क्यों घुट रही हो मेरे साथ?.......मुझे छोड़ क्यों नहीं देती?" सुबोध की आँखों से बहते आँसू भी उसका दर्द नहीं बयान कर पा रहे थे।


"ऐसा क्यों कहते हैं?......मैं आपको नहीं छोड़ने वाली!" नलिनी ने दिलासा देते हुए कहा।


"मैं सिर्फ चंद दिनों का परिंदा हुँ नलिनी, ...... कब उड़ जाऊंगा पता नहीं,..... तुम्हारे सामने पूरी जिंदगी पड़ी है......" सुबोध की बातें उसके दिल को तार-तार कर रही थी, कुछ पलों की चुप्पी के बाद सुबोध की तरफ़ देखते हुए बोली "सही कहा,...... मेरी जिंदगी तो यहाँ मेरे सामने ....... पड़ी हुई है" और मुस्कुराने की कोशिश करने लगी।


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जारी है अगले भाग में......

08 Mart 2022 15:54:21 0 Rapor Yerleştirmek Hikayeyi takip edin
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