ajayamitabh7 AJAY AMITABH

जब मर्ज झूठा हो तो उसका इलाज सच्चा कैसे हो सकता है? मानव मस्तिष्क के मनोविज्ञान पर प्रकाश डालती हुई कहानी।


Kurzgeschichten Alles öffentlich.

#]
Kurzgeschichte
0
1.4k ABRUFE
Abgeschlossen
Lesezeit
AA Teilen

वहम

जून का महीना था। शाम के 6 बजे थे फिर भी काफी तेज रोशनी थी सड़क पर। अमूमनतया दिल्ली में इस समय तक काफी गर्मी पड़ने लगती है। परंतु दिल्ली सरकार द्वारा कोरोना की दूसरी लहर से बचने के लिए जो लॉक डाउन लागू किया गया था , उसका असर सड़कों पर साफ साफ दिखाई पड़ रहा था। नेहरू प्लेस की मुख्य सड़क लगभग सुनसान हीं थीं। कार पार्किंग में जहाँ गाड़ियाँ पहले ठसाठस भरी रहती थी , आज वो लगभग खाली थी।


जहाँ पहले बाइक , ऑटो रिक्शा , कार और बसों की शोरगुल से सारा वातावरण अशांत रहता था, आज वहीं पेड़ों की डालों पर बैठीं चिड़ियों की चहचहाहट से गुंजायमान हो रहा था। शर्मा जी का ऑफिस नेहरू प्लेस के पास हीं था। आज कल ऑफिस से घर जल्दी हीं चले जाते थे।ऑफिस में काम कम हीं था। ऑफिस से घर की दूरी तकरीबन 3 किलोमीटर की थी । बुजुर्ग थे सो कोलेस्ट्रॉल की समस्या से पहले हीं जूझ रहे थे। ये तो सौभाग्य था कि मधुमेह का शिकार नहीं थे। शायद शारीरिक श्रम करने की आदत ने उन्हें अब तक बचा रखा था ।


डॉक्टर ने बता रखा था कि शारीरिक श्रम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, लिहाजा वो पैदल हीं जाया करते थे। और पब्लिक ट्रांसपोर्ट तो आजकल वैसे हीं दूज का चाँद हो रखा था। पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर ओला, उबेर आदि की कारें या ऑटो रिक्शा हीं मिलते थे ,जो कि काफी महंगे पड़ते थे, लिहाजा पैदल चलने से जेब पर बोझ भी कम हीं पड़ता था । कोरोना से बचने के लिए हाथों पर सैनिटाइजर छिड़क लिया था। नाक पर मास्क पहनना भी जरुरी था सो मास्क लगाकर धीरे धीरे घर की ओर बढ़ रहे थे।


हालाँकि रोड पर इक्के दुक्के यात्री दिखाई पड़ हीं जाते थे, शायद मजबूरी के मारे। तीस पर एम्बुलेंस वैन की आती जाती आवाजें वातावरण में भयावहता का माहौल और बढ़ा देती थीं। फिर भी पापी पेट का सवाल था, नौकरी के चक्कर में ऑफिस जाना हीं पड़ता था। स्थिती कुछ ऐसी हो चली थी जैसे कि देश की सेना पर तैनात एक सैनिक का होता है। जब तक बचे हैं तब तक बचे हैं। पता नहीं कब किस मोड़ पर दुश्मन की गोलियों का शिकार हो जाएं।


ठीक वैसे हीं आजकल शर्मा जी लगता था। रोज व्हाट्सएप्प और फेसबुक पर किसी न किसी मित्र के जाने का समाचार मिलते हीं रहता था। ऐसा लग रहा था जैसे व्हाट्सएप्प और फेसबुक श्रद्धांजलि देने का प्लेटफॉर्म बन चुके हैं । पता नहीं कब, कहाँ और किस मोड़ पर कौन सा व्यक्ति कोरोना की जद में आ जाये, कहा नहीं जा सकता।


कौन सा ऐसा घर बचा था शहर में जहाँ पे किसी परिवार का कोई परिचित या रिश्तेदार की मृत्यु ना हुई हो।इधर सरकार अपने संसाधनों का इस्तेमाल मृत्यु के आंकड़ों को छुपाने में हीं कर रही थी। राज्य सरकार और केंद्र सरकार का काम मृत्यु के आंकड़ों को छुपाना, सोशल मीडिया और विसुअल मीडिया पर अपना प्रचार करना और एक दूसरे पर दोषारोपण करने के अलावा कुछ और नहीं बचा था।


सरकारें कोरोना से लड़ने में नाकाम सिद्ध हो रही थीं । कोरोना की दूसरी लहर ने मेडिकल व्यवस्था की खस्ता हाल को उजागर कर दिया था । ओक्सिजन की किल्लत ने आखिर कितनों की जान ले ली । सरकार के पास लॉक डाउन लगाने के अलावा कोई और उपाय नहीं था । इन अव्यस्था के बीच जनता पीस रही थी, जनता मार रही थी। जब तक कोई बचा है तब तक बचा है । खैर एक व्यक्ति के हाथ मे उपाय होता है, वो ही कर सकता है। बाकी खुदा की मर्जी।


नेहरू प्लेस के मुख्य मार्किट को क्रॉस करके शर्मा जी मुख्य सड़क पर आए हीं थे कि अचानक उनकी नजर एक औरत पे पड़ी जो लगातार सुबकती हीं चली जा रही थी। एक बुजुर्ग भी उस औरत के पास हीं खड़े थे। जब कोई अपना होता है जो अपनापन का एहसास होने हीं लगता था। शर्मा जी छठी इंद्रियां जागृत हो उठी। किसी चिर परिचित के होने का एहसास करा रही थीं। पास जाकर देखा तो वो अग्रवाल जी थे। शर्मा जी बहुत दिनों से उनको जान रहे थे।


नेहरू प्लेस के पास बराबर वाली ऑफिस में हीं काम करते थे। काफी पुरानी जान पहचान थी उनकी अग्रवाल जी साथ। अक्सर नेहरू प्लेस मार्किट में दोनों चाट पकौड़ी का मजा लेते थे। खासकर लॉंच टाइम में दोनों अपने अन्य सहकर्मियों के साथ मार्केट का लुत्फ लेते थे। चीजों को खरीदने का सामर्थ्य तो था नहीं , लिहाजा देखकर हीं काम चला लिया करते थे। अब तो वो दिन बस सपने की तरह हीं हो चले थे । पता नहीं वो बेफिक्री कब आये, कहा नहीं जा सकता।


अग्रवाल जी उस औरत को बार-बार कुछ समझाने की कोशिश कर रहे थे। बातचीत के लहजे से वो उनकी करीबी हीं लग रही थी। पूछने पे ज्ञात हुआ वो औरत अग्रवाल जी की बेटी थी। माजरा ये था कि उनकी बेटी के बाएँ कान का झुमका गिर गया था। वो लड़की अपने पति को अपोलो हॉस्पिटल में देखने जा रही थी। अग्रवाल जी के दामाद कोरोना की चपेट में आ गए थे और अपोलो हॉस्पिटल में उनका इलाज चल रहा था। अग्रवाल जी के बेटी को ये वहम था कि बाएँ कान के झुमके का गिरना एक अपशगुन है। उसे ऐसा लग रहा था कि उसके पति के साथ कुछ बुरा होने वाला है।


अग्रवाल जी अपनी बेटी को समझा समझा थक गए थे। आखिर किस किताब में लिखी है ये बात ? कहाँ लिखा है कि बाएँ हाथ का झुमका गिरना अशुभ होता है ? और तो और, क्या पता वो घर पर हीं कहीं गिर गया हो ? कौन जानता है ? दामाद जी इस शहर के अच्छे होस्पिटलों में से एक में भर्ती हैं । एक से बढ़ कर एक डॉक्टर उनका ईलाज कर रहे हैं । तिस पर से वो जवान हैं । उन्हें कुछ नहीं होगा । पर अग्रवाल जी की बेटी थी , कि कुछ समझने को तैयार ही नहीं थी । ना तो वो समझने की स्थिति में थी और ना हीं कुछ सुनने की ।


शर्मा जी समझ गए कि अग्रवाल जी के बेटी वहम की शिकार है। एक तो माहौल वैसे हीं खराब था , तिस पर से ये वहम। इसका ईलाज कैसे हो ? कुछ उपाय सूझ नहीं रहा था । अचानक उनके दिमाग में एक विचार सुझा । अग्रवाल जी के बेटी के नजदीक जाकर उन्होंने कहा- मैं ज्योतिषाचार्य हूँ। शर्मा जी ने आगे बताया कि दाएं कान का झुमका गिरना अपशगुन है, ना कि बाएँ कान का।


अपनी बातों का असर होते देखकर उन्होंने आगे बताया , ये बात लाल किताब में लिखी हुई है । विश्वास ना हो तो चलो मेरे साथ , मेरे घर पर ये किताब रखी हुई है । सातवें अध्याय के तीसरे भाग में शुभ संकेतों के बारे में वर्णन करते हुए ये बात लिखी गई है । विश्वास करो , ये तो शुभ संकेत है। ईश्वर ने तुम्हे ये संकेत दिया है कि कोरोना तुम्हारे पति का बाल भी बांका नहीं कर सकता। यह सुनते ही अग्रवाल जी के बेटी के चेहरे पे मुस्कान आ गई। पिता और पुत्री दोनों ख़ुशी ख़ुशी आगे चल दिए। इधर शर्मा जी भी अपने घर को चल पड़े।


लगभग 10 दिनों बाद शर्मा जी की मुलाकात अग्रवाल जी से हुई। लॉक डाउन में भी थोड़ी ढील दी जा चुकी थी । सडकों पर वाहनों का आवागमन थोड़ा बढ़ गया था । आज अग्रवाल जी काफी खुश दिखाई पड़ थे। वो शर्मा जी के ज्योतिष के ज्ञान की काफी तारीफ कर रहे थे। अग्रवाल जी ने बताया कि उनके दामाद लगभग 1 सप्ताह पहले ठीक होकर घर आ गए थे। शर्मा जी का धन्यवाद कर आगे बढ़ गए । खैर शर्मा जी कोई ज्योतिषाचार्य तो थे नहीं । अग्रवाल जी की बेटी वहम का शिकार थी। उन्होंने उसका इलाज दूसरे वहम से कर दिया था। जब मर्ज हीं झूठा हो तो उसका इलाज सच्चा कैसे हो सकता था?


शर्मा जी आगे बढ़ गए। सामने से एक काली बिल्ली रास्ता काटते हुई चली गई। ये देख कर एक बाइक वाला रुक गया । वो किसी दुसरे व्यक्ति का इन्तेजार करने लगा कि कोई दूसरा आकर रोड पार कर जाये। आखिर काली बिल्ली जो रास्ता काट गई थी । शर्मा जी मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए । बाइक सवार ने शर्मा जी को सड़क पार करते हुए देख कर अपनी बाइक को आगे बढ़ा दिया। आखिर कितनों के वहम का इलाज करे शर्मा जी ?


अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

14. Juni 2021 15:34:05 0 Bericht Einbetten Follow einer Story
0
Das Ende

Über den Autor

AJAY AMITABH Advocate, Author and Poet

Kommentiere etwas

Post!
Bisher keine Kommentare. Sei der Erste, der etwas sagt!
~